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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
तपनीय़मय़ैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः |  १४   क
उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः |  १४   ख
गतसत्त्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घवाहुना ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति