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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
निवार्य तु रणे द्रोणो युय़ुधानं महारथम् |  १८   क
विव्याध निशितैर्वाणैः पञ्चभिर्मर्मभेदिभिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति