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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
युय़ुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः |  २२   क
एकेन सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् |  २२   ख
ध्वजमेकेन वाणेन विव्याध युधि मारिष ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति