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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
तथैव युय़ुधानोऽपि द्रोणं वहुभिराशुगैः |  २४   क
प्राच्छादय़दसम्भ्रान्तस्ततो द्रोण उवाच ह ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति