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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा |  २५   क
युध्यमानं हि मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति