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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
एतावदुक्त्वा शैनेय़ आचार्यं परिवर्जय़न् |  २८   क
प्रय़ातः सहसा राजन्सारथिं चेदमव्रवीत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति