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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे |  २९   क
यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति