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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत |  ३   क
यथा सुखेन गच्छेत सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति