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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
स तत्र वहुभिः शूरैः संनिरुद्धो महारथैः |  ५४   क
न चचाल तदा राजन्सात्यकिः सत्यविक्रमः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति