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द्रोण पर्व
अध्याय ८८
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सञ्जय़ उवाच
समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् |  ५७   क
पाञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः |  ५७   ख
विक्रम्य वारिता राजन्वीरेण कृतवर्मणा ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति