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वन पर्व
अध्याय २४२
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वैशम्पाय़न उवाच
शेषास्तु पाण्डवा राजन्नैवोचुः किञ्चिदप्रिय़म् |  १६   क
दूतश्चापि यथावृत्तं धार्तराष्ट्रे न्यवेदय़त् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति