शान्ति पर्व  अध्याय १३७

व्रह्मदत्त उवाच

एवं वसेह सस्नेहा यथाकालमहिंसिता |  ४९   क
यत्कृतं तच्च मे क्षान्तं त्वं चैव क्षम पूजनि ||  ४९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति