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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
अहमेनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् |  ३८   क
नय़ामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति