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कर्ण पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं; भृशाभिघातात्पतितं विचूर्णितम् |  ३८   क
महेन्द्रवज्राभिहतं महावनं; यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति