विराट पर्व  अध्याय २७

वैशम्पाय़न उवाच

यत्तु शक्यमिहास्माभिस्तान्वै सञ्चिन्त्य पाण्डवान् |  ९   क
वुद्ध्या प्रवक्तुं न द्रोहात्प्रवक्ष्यामि निवोध तत् ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति