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वन पर्व
अध्याय ८९
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वैशम्पाय़न उवाच
यच्च किञ्चित्तपोय़ुक्तं फलं तीर्थेषु भारत |  २२   क
महर्षिरेष यद्व्रूय़ात्तच्छ्रद्धेय़मनन्यथा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति