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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तं पादपैः पुष्पधरैरुपेतं; नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् |  ३   क
मनःप्रसादः परमो वभूव; यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति