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विराट पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षमय़न्तं तु राजानं पाण्डवः प्रत्यभाषत |  ७   क
चिरं क्षान्तमिदं राजन्न मन्युर्विद्यते मम ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति