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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
स सात्यकेराशु वचो निशम्य; रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् |  ३३   क
मसारगल्वर्कमय़ैर्विभङ्गै; र्विभूषितं हेमपिनद्धचक्रम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति