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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सूत उवाच
आय़ुष्मन्कतरेण त्वा प्रापय़ामि धनञ्जय़म् |  १८   क
केषां क्रुद्धोऽसि वार्ष्णेय़ केषां मृत्युरुपस्थितः |  १८   ख
केषां संय़मनीमद्य गन्तुमुत्सहते मनः ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति