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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां; शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् |  ३   क
यदृच्छय़ा सूर्यमिवावनिस्थं; दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति