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वन पर्व
अध्याय १८७
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देव उवाच
यच्च किञ्चित्त्वय़ा प्राप्तं मय़ि क्लेषात्मकं द्विज |  ३६   क
सुखोदय़ाय़ तत्सर्वं श्रेय़से च तवानघ ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति