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उद्योग पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो द्रुपदमानाय़्य विराटं शिनिपुङ्गवम् |  १०   क
धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यं धृष्टकेतुं च पार्थिवम् |  १०   ख
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं सहदेवं च मागधम् ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति