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सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
वृतं समन्ताद्वहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः |  ४   क
शालावृकगणैश्चैव भक्षय़िष्यद्भिरन्तिकात् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति