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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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महेश्वर उवाच
तां दिदृक्षुरहं योगाच्चतुर्मूर्तित्वमागतः |  ४   क
चतुर्मुखश्च संवृत्तो दर्शय़न्योगमात्मनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति