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शान्ति पर्व
अध्याय ९
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युधिष्ठिर उवाच
न चाप्यवहसन्कञ्चिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित् |  १७   क
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वेन्द्रिय़सुसंय़तः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति