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शान्ति पर्व
अध्याय ९
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युधिष्ठिर उवाच
एककालं चरन्भैक्ष्यं गृहे द्वे चैव पञ्च च |  २३   क
स्पृहापाशान्विमुच्याहं चरिष्यामि महीमिमाम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति