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कर्ण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
मही विय़द्द्यौः सलिलानि वाय़ुना; यथा विभिन्नानि विभान्ति भारत |  १८   क
तथैव शव्दो भुवनेष्वभूत्तदा; जना व्यवस्यन्व्यथिताश्च चस्खलुः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति