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शल्य पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
तत्सैन्यं भरतश्रेष्ठ मुहूर्तेन महात्मभिः |  ११   क
अवध्यत रणं प्राप्य त्रातारं नाभ्यविन्दत |  ११   ख
प्रतिष्ठमानं तु भय़ान्नावतिष्ठत दंशितम् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति