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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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मरुत्त उवाच
कच्चिच्छ्रीमान्देवराजः सुखी च; कच्चिच्चास्मान्प्रीय़ते धूमकेतो |  १३   क
कच्चिद्देवाश्चास्य वशे यथाव; त्तद्व्रूहि त्वं मम कार्त्स्न्येन देव ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति