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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र; प्रीतिं चेच्छत्यजरां वै त्वय़ा सः |  १४   क
देवाश्च सर्वे वशगास्तस्य राज; न्सन्देशं त्वं शृणु मे देवराज्ञः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति