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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
यदर्थं मां प्राहिणोत्त्वत्सकाशं; वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |  १५   क
अय़ं गुरुर्याजय़िता नृप त्वां; मर्त्यं सन्तममरं त्वां करोतु ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति