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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
ये वै लोका देवलोके महान्तः; सम्प्राप्स्यसे तान्देवराजप्रसादात् |  १७   क
त्वां चेदसौ याजय़ेद्वै वृहस्पति; र्नूनं स्वर्गं त्वं जय़ेः कीर्तिय़ुक्तः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति