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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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वृहस्पतिरु उवाच
सुखं शय़ेऽहं शय़ने महेन्द्र; तथा मनोज्ञाः परिचारका मे |  २   क
तथा देवानां सुखकामोऽस्मि शक्र; देवाश्च मां सुभृशं पालय़न्ति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति