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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
न ते वाचं रोचय़ते मरुत्तो; वृहस्पतेरञ्जलिं प्राहिणोत्सः |  २२   क
संवर्तो मां याजय़ितेत्यभीक्ष्णं; पुनः पुनः स मय़ा प्रोच्यमानः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति