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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
यद्यागच्छेः पुनरेवं कथं चि; द्वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |  २६   क
दहेय़ं त्वां चक्षुषा दारुणेन; सङ्क्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति