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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
दिवं देवेन्द्र पृथिवीं चैव सर्वां; संवेष्टय़ेस्त्वं स्ववलेनैव शक्र |  २८   क
एवंविधस्येह सतस्तवासौ; कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग्जहार ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति