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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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इन्द्र उवाच
न चण्डिका जङ्गमा नो करेणु; र्न वारिसोमं प्रपिवामि वह्ने |  २९   क
न दुर्वले वै विसृजामि वज्रं; को मेऽसुखाय़ प्रहरेन्मनुष्यः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति