आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ९

इन्द्र उवाच

कुतो दुःखं मानसं देहजं वा; पाण्डुर्विवर्णश्च कुतस्त्वमद्य |  ३   क
आचक्ष्व मे तद्द्विज यावदेता; न्निहन्मि सर्वांस्तव दुःखकर्तॄन् ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति