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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
वज्रं गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं; सम्प्राहार्षीश्च्यवनस्यातिघोरम् |  ३२   क
स ते विप्रः सह वज्रेण वाहु; मपागृह्णात्तपसा जातमन्युः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति