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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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अग्निरु उवाच
हनुरेका जगतीस्था तथैका; दिवं गता महतो दानवस्य |  ३४   क
सहस्रं दन्तानां शतय़ोजनानां; सुतीक्ष्णानां घोररूपं वभूव ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति