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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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वृहस्पतिरु उवाच
देवैः सह त्वमसुरान्सम्प्रणुद्य; जिघांससेऽद्याप्युत सानुवन्धान् |  ६   क
यं यं समृद्धं पश्यसि तत्र तत्र; दुःखं सपत्नेषु समृद्धभावः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति