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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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वृहस्पतिरु उवाच
अतोऽस्मि देवेन्द्र विवर्णरूपः; सपत्नो मे वर्धते तन्निशम्य |  ७   क
सर्वोपाय़ैर्मघवन्संनिय़च्छ; संवर्तं वा पार्थिवं वा मरुत्तम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति