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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
गिरिं य इच्छेत तलेन भेत्तुं; शिलोच्चय़ं श्वेतमतिप्रमाणम् |  ६६   क
तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये; न्न चापि किञ्चित्स गिरेस्तु कुर्यात् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति