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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण ज्वलितार्कतेजसा; क्षुरेण राज्ञो धनुरुन्ममाथ |  २३   क
कृपश्च तस्यैव जघान सूतं; षड्भिः शरैः सोऽभिमुखं पपात ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति