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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ऊर्ध्ववाहुर्विशालाय़ां वदर्यां स नराधिपः |  ४   क
एकपादस्थितस्तीव्रं चचार सुमहत्तपः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति