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विराट पर्व
अध्याय ९
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विराट उवाच
शतं सहस्राणि समाहितानि; वर्णस्य वर्णस्य विनिश्चिता गुणैः |  १४   क
पशून्सपालान्भवते ददाम्यहं; त्वदाश्रय़ा मे पशवो भवन्त्विह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति