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विराट पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा स राज्ञोऽविदितो विशां पते; उवास तत्रैव सुखं नरेश्वरः |  १५   क
न चैनमन्येऽपि विदुः कथञ्चन; प्रादाच्च तस्मै भरणं यथेप्सितम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति