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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा |  ३१   क
प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति