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उद्योग पर्व
अध्याय ९
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शल्य उवाच
विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादपावृतात् |  ४८   क
स्वान्यङ्गान्यभिसङ्क्षिप्य निष्क्रान्तो वलसूदनः |  ४८   ख
ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंश्रिता ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति